المَكتَبَةُ الشَّامِلَةُ السُّنِّيَّةُ

الرئيسية

أقسام المكتبة

المؤلفين

القرآن

البحث 📚

وهنا أثارها موسى شبهة؛ كي نسمع نحن الجواب، ولنسمع الردّ - تفسير الشعراوي - جـ ١٥

[الشعراوي]

فهرس الكتاب

- ‌ 99]

- ‌ 101]

- ‌ 102]

- ‌ 103]

- ‌ 104]

- ‌ 105]

- ‌ 106]

- ‌ 107]

- ‌ 109]

- ‌ 110]

- ‌ 4]

- ‌ 6]

- ‌ 7]

- ‌ 9]

- ‌ 10]

- ‌ 11]

- ‌ 12]

- ‌ 17]

- ‌ 18]

- ‌ 19]

- ‌ 20]

- ‌ 22]

- ‌ 23]

- ‌ 24]

- ‌ 28]

- ‌ 30]

- ‌ 34]

- ‌ 36]

- ‌ 38]

- ‌ 39]

- ‌ 40]

- ‌ 41]

- ‌ 43]

- ‌ 44]

- ‌ 45]

- ‌ 46]

- ‌ 47]

- ‌ 49]

- ‌ 50]

- ‌ 52]

- ‌ 54]

- ‌ 55]

- ‌ 56]

- ‌ 58]

- ‌ 59]

- ‌ 60]

- ‌ 61]

- ‌ 62]

- ‌ 63]

- ‌ 65]

- ‌ 68]

- ‌ 69]

- ‌ 75]

- ‌ 76]

- ‌ 78]

- ‌ 80]

- ‌ 82]

- ‌ 84]

- ‌ 86]

- ‌ 87]

- ‌ 92]

- ‌ 93]

- ‌ 95]

- ‌ 96]

- ‌ 98]

- ‌(طه)

- ‌ 2]

- ‌4]

- ‌ 10]

- ‌ 11]

- ‌ 12]

- ‌ 13]

- ‌ 14]

- ‌ 15]

- ‌ 18]

- ‌ 21]

- ‌ 25]

- ‌ 26]

- ‌ 33]

- ‌ 37]

- ‌ 42]

- ‌ 44]

- ‌ 45]

- ‌ 47]

- ‌ 48]

- ‌ 50]

- ‌ 52]

- ‌ 53]

- ‌ 55]

- ‌ 57]

- ‌ 58]

- ‌ 59]

- ‌ 60]

- ‌ 61]

- ‌ 62]

- ‌ 63]

- ‌ 64]

- ‌ 67]

- ‌ 68]

- ‌ 69]

- ‌ 71]

- ‌ 72]

- ‌ 73]

- ‌ 74]

- ‌ 75]

- ‌ 77]

- ‌ 78]

- ‌ 80]

- ‌ 81]

- ‌ 84]

- ‌ 86]

- ‌ 87]

- ‌ 88]

- ‌ 90]

- ‌ 91]

- ‌ 92]

- ‌ 94]

- ‌ 96]

- ‌ 97]

- ‌ 98]

- ‌ 102]

- ‌ 103]

- ‌ 104]

- ‌ 106] :

- ‌ 108]

- ‌ 110]

- ‌ 112]

- ‌ 114]

- ‌ 115]

- ‌ 117]

- ‌ 118]

- ‌ 124]

- ‌ 125]

- ‌ 126]

- ‌ 127]

- ‌ 128]

- ‌ 130]

- ‌ 131]

- ‌ 132]

- ‌ 133]

- ‌ 135]

- ‌[الأنبياء:

- ‌1]

- ‌ 2]

- ‌ 3]

- ‌ 4]

- ‌ 5]

- ‌ 7]

- ‌ 8]

- ‌ 12]

- ‌ 13]

- ‌ 14]

- ‌ 15]

- ‌ 17]

- ‌ 18]

- ‌ 19]

- ‌ 20

- ‌ 21]

- ‌ 22]

- ‌ 25]

- ‌ 26]

- ‌ 27]

- ‌ 28]

- ‌ 29]

- ‌ 30]

- ‌ 31]

- ‌ 35]

- ‌ 36]

- ‌ 37]

- ‌ 39]

- ‌ 40]

- ‌ 41]

- ‌ 42]

- ‌ 43]

- ‌ 44]

- ‌ 45]

- ‌ 46]

- ‌ 48]

- ‌ 49]

- ‌ 50]

- ‌ 51]

- ‌ 52]

- ‌ 53]

- ‌ 56]

- ‌ 57]

- ‌ 58]

- ‌ 59]

- ‌ 61]

- ‌ 62]

- ‌ 63]

- ‌ 64]

- ‌ 65]

- ‌ 68]

- ‌ 71]

- ‌ 73]

- ‌ 74]

- ‌ 75]

- ‌ 76]

- ‌ 79]

- ‌ 80]

- ‌ 81]

- ‌ 82]

- ‌ 83]

- ‌ 85]

- ‌ 88]

الفصل: وهنا أثارها موسى شبهة؛ كي نسمع نحن الجواب، ولنسمع الردّ

وهنا أثارها موسى شبهة؛ كي نسمع نحن الجواب، ولنسمع الردّ من صاحب الشأن باقياً سائراً في طول الأزمان.

ص: 9366

إذن: صاحبَ خطابَ موسى لأخيه هارون فعْل نزوعيٌّ وحركة، فهمناها من قول هارون:{يَبْنَؤُمَّ لَا تَأْخُذْ بِلِحْيَتِي وَلَا بِرَأْسِي} [طه:‌

‌ 94]

.

ثم ذكر العلة {إِنِّي خَشِيتُ أَن تَقُولَ فَرَّقْتَ بَيْنَ بني إِسْرَآئِيلَ وَلَمْ تَرْقُبْ قَوْلِي} [طه: 94] يقصد قول أخيه: {اخلفني فِي قَوْمِي وَأَصْلِحْ وَلَا تَتَّبِعْ سَبِيلَ المفسدين} [الأعراف: 142] .

فذكّره بالتفويض الذي أعطاه إياه. وقد اجتهد هارون حَسْب رؤيته للموقف، ونأى بالقوم عن معركة ربما انتهتْ بالقضاء على خَِلِية الإيمان في بني إسرائيل، اجتهد في إطار {وَأَصْلِحْ} [الأعراف: 142] .

إذن: أثار موسى هذه القضية مع أخيه، لا ليسمع هو الرد، وإنما ليُسمع الدنيا كلّها على مَرِّ التاريخ.

ثم ينقل موسى الخطاب إلى رأس هذه الفتنة: {قَالَ فَمَا خَطْبُكَ ياسامري}

ص: 9366

أي: ما شأنك؟ وما قصتك؟

ص: 9366