المَكتَبَةُ الشَّامِلَةُ السُّنِّيَّةُ

الرئيسية

أقسام المكتبة

المؤلفين

القرآن

البحث 📚

وسكت عنه هو، وابن عراق في "تنزيه الشريعة" (1/ 373) - سلسلة الأحاديث الضعيفة والموضوعة وأثرها السيئ في الأمة - جـ ١١

[ناصر الدين الألباني]

فهرس الكتاب

- ‌المقدمة:

- ‌5001

- ‌5002

- ‌5003

- ‌5004

- ‌5005

- ‌5006

- ‌5007

- ‌5008

- ‌5009

- ‌5010

- ‌5011

- ‌5012

- ‌5013

- ‌5014

- ‌5015

- ‌5016

- ‌5017

- ‌5018

- ‌5019

- ‌5020

- ‌5021

- ‌5022

- ‌5023

- ‌5025

- ‌5026

- ‌5027

- ‌5028

- ‌5029

- ‌5030

- ‌5031

- ‌5032

- ‌5033

- ‌5034

- ‌5035

- ‌5036

- ‌5037

- ‌5038

- ‌5039

- ‌5040

- ‌5041

- ‌5042

- ‌5043

- ‌5043/ م

- ‌5044

- ‌5045

- ‌5046

- ‌5047

- ‌5048

- ‌5049

- ‌5050

- ‌5051

- ‌5052

- ‌5053

- ‌‌‌5054

- ‌5054

- ‌5055

- ‌5056

- ‌5057

- ‌5058

- ‌5059

- ‌5060

- ‌5061

- ‌5062

- ‌5063

- ‌5064

- ‌5065

- ‌5066

- ‌5067

- ‌5068

- ‌5069

- ‌5070

- ‌5071

- ‌5072

- ‌5073

- ‌5074

- ‌5075

- ‌5076

- ‌5077

- ‌5078

- ‌5079

- ‌5080

- ‌5081

- ‌5082

- ‌5083

- ‌5084

- ‌5085

- ‌5086

- ‌5087

- ‌5088

- ‌5089

- ‌5090

- ‌5091

- ‌5092

- ‌5093

- ‌5094

- ‌5095

- ‌5096

- ‌5097

- ‌5098

- ‌5099

- ‌5100

- ‌5101

- ‌5102

- ‌5103

- ‌5104

- ‌5105

- ‌5106

- ‌5107

- ‌5108

- ‌5109

- ‌5110

- ‌5111

- ‌5112

- ‌5113

- ‌5114

- ‌5116

- ‌5117

- ‌5118

- ‌5119

- ‌5120

- ‌5121

- ‌5122

- ‌5123

- ‌5124

- ‌5125

- ‌5126

- ‌5127

- ‌5128

- ‌5129

- ‌5130

- ‌5131

- ‌5132

- ‌5133

- ‌5134

- ‌5135

- ‌5136

- ‌5137

- ‌5138

- ‌5139

- ‌5140

- ‌5141

- ‌5141/ م

- ‌5142

- ‌5142/ م

- ‌5143

- ‌5144

- ‌5145

- ‌5146

- ‌5147

- ‌5148

- ‌5149

- ‌5150

- ‌5151

- ‌5152

- ‌5153

- ‌5154

- ‌5155

- ‌5156

- ‌5157

- ‌5158

- ‌5159

- ‌5160

- ‌5161

- ‌5162

- ‌5163

- ‌5164

- ‌5165

- ‌5166

- ‌5167

- ‌5168

- ‌5169

- ‌5170

- ‌5171

- ‌5172

- ‌5173

- ‌5174

- ‌5175

- ‌5176

- ‌5177

- ‌5179

- ‌5180

- ‌5181

- ‌5182

- ‌5183

- ‌5184

- ‌5185

- ‌5186

- ‌5187

- ‌5188

- ‌5189

- ‌5190

- ‌5191

- ‌5192

- ‌5193

- ‌5194

- ‌5195

- ‌5196

- ‌5197

- ‌5198

- ‌5199

- ‌5200

- ‌5201

- ‌5202

- ‌5203

- ‌5204

- ‌5205

- ‌5206

- ‌5207

- ‌5208

- ‌5209

- ‌5210

- ‌5211

- ‌5212

- ‌5213

- ‌5214

- ‌5215

- ‌5216

- ‌5217

- ‌5218

- ‌5219

- ‌5220

- ‌5221

- ‌5222

- ‌5223

- ‌5224

- ‌5225

- ‌5226

- ‌5227

- ‌5228

- ‌5229

- ‌5230

- ‌5231

- ‌5232

- ‌5233

- ‌5234

- ‌5235

- ‌5236

- ‌5237

- ‌5238

- ‌5239

- ‌5240

- ‌5241

- ‌5242

- ‌5243

- ‌5244

- ‌5245

- ‌5246

- ‌5247

- ‌5248

- ‌5249

- ‌5250

- ‌5251

- ‌5252

- ‌5253

- ‌5254

- ‌5255

- ‌5256

- ‌5257

- ‌5258

- ‌5259

- ‌5260

- ‌5261

- ‌5262

- ‌5263

- ‌5264

- ‌5265

- ‌5266

- ‌5267

- ‌5268

- ‌5269

- ‌5270

- ‌5271

- ‌5272

- ‌5273

- ‌5274

- ‌5275

- ‌5276

- ‌5277

- ‌5279

- ‌5280

- ‌5281

- ‌5282

- ‌5283

- ‌5284

- ‌5285

- ‌5286

- ‌5287

- ‌5288

- ‌5289

- ‌5290

- ‌5291

- ‌5293

- ‌5294

- ‌5295

- ‌5296

- ‌5297

- ‌5298

- ‌5299

- ‌5300

- ‌5301

- ‌5302

- ‌5303

- ‌5304

- ‌5305

- ‌5306

- ‌5307

- ‌5308

- ‌5309

- ‌5310

- ‌5311

- ‌5312

- ‌5313

- ‌5314

- ‌5315

- ‌5316

- ‌5317

- ‌5318

- ‌5319

- ‌5320

- ‌5321

- ‌5322

- ‌5323

- ‌5324

- ‌5325

- ‌5326

- ‌5327

- ‌5328

- ‌5329

- ‌5330

- ‌5331

- ‌5332

- ‌5333

- ‌5334

- ‌5335

- ‌5336

- ‌5337

- ‌5338

- ‌5339

- ‌5340

- ‌5341

- ‌5342

- ‌5343

- ‌5344

- ‌5345

- ‌5346

- ‌5347

- ‌5348

- ‌5349

- ‌5350

- ‌5351

- ‌5352

- ‌5353

- ‌5354

- ‌5355

- ‌5356

- ‌5357

- ‌5358

- ‌5359

- ‌5360

- ‌5361

- ‌5362

- ‌5363

- ‌5364

- ‌5365

- ‌5366

- ‌5367

- ‌5368

- ‌5369

- ‌5370

- ‌5371

- ‌5372

- ‌5373

- ‌5374

- ‌5375

- ‌5376

- ‌5377

- ‌5378

- ‌5379

- ‌5380

- ‌5381

- ‌5382

- ‌5383

- ‌5384

- ‌5385

- ‌5386

- ‌5387

- ‌5388

- ‌5389

- ‌5390

- ‌5391

- ‌5392

- ‌5393

- ‌5394

- ‌5395

- ‌5396

- ‌5397

- ‌5398

- ‌5399

- ‌5400

- ‌5401

- ‌5402

- ‌5403

- ‌5404

- ‌5405

- ‌5406

- ‌5408

- ‌5409

- ‌5410

- ‌5411

- ‌5412

- ‌5413

- ‌5414

- ‌5415

- ‌5416

- ‌5417

- ‌5418

- ‌5419

- ‌5420

- ‌5421

- ‌5422

- ‌5423

- ‌5424

- ‌5425

- ‌5426

- ‌5427

- ‌5428

- ‌5429

- ‌5430

- ‌5431

- ‌5432

- ‌5433

- ‌5434

- ‌5435

- ‌5436

- ‌5437

- ‌5438

- ‌5439

- ‌5440

- ‌5441

- ‌5442

- ‌5443

- ‌5444

- ‌5445

- ‌5446

- ‌5447

- ‌5448

- ‌5449

- ‌5450

- ‌5451

- ‌5452

- ‌5453

- ‌5454

- ‌5455

- ‌5456

- ‌5457

- ‌5458

- ‌5459

- ‌5460

- ‌5461

- ‌5462

- ‌5463

- ‌5464

- ‌5465

- ‌5466

- ‌5467

- ‌5468

- ‌5469

- ‌5470

- ‌5471

- ‌5472

- ‌5473

- ‌5474

- ‌5475

- ‌5476

- ‌5477

- ‌5478

- ‌5479

- ‌5480

- ‌5481

- ‌5482

- ‌5483

- ‌5484

- ‌5485

- ‌5486

- ‌5487

- ‌5488

- ‌5489

- ‌5490

- ‌5491

- ‌5492

- ‌5493

- ‌5494

- ‌5495

- ‌5496

- ‌5497

- ‌5498

- ‌5499

- ‌5500

الفصل: وسكت عنه هو، وابن عراق في "تنزيه الشريعة" (1/ 373)

وسكت عنه هو، وابن عراق في "تنزيه الشريعة"(1/ 373) !

وليس بصواب؛ فإن ابن أبان هذا كذاب دجال من الدجاجلة، يضع الحديث على الثقات وضعاً؛ كما قال ابن حبان (1/ 149-150) . وقال الدارقطني:

"حدثونا عنه، وهو كذاب".

ومن طريقه: أخرجه الصابوني في "المئتين"، وقال:

"حديث غريب".

وبالجملة؛ فالحديث باطل من جميع طرقه.

وأما الشواهد التي ذكرها له السيوطي؛ فهي مع كونها شواهد قاصرة؛ فهي ما بين موقوف ومقطوع، وخيرها حديث ابن عمر مرفوعاً:

"دفن بالطينة التي خلق منها".

فهذا القدر ثابت؛ لأن له شواهد مرفوعة، يرتقي بها إلى مرتبة الحسن، ولذلك؛ خرجته في "الصحيحة"(1858) .

‌5241

- (لا تدعوا الركعتين اللتين قبل صلاة الفجر؛ فإن فيهما الرغائب) .

ضعيف

أخرجه الطبراني في "المعجم الكبير"(3/ 203/ 2-204/ 1) ، وابن ثرثال في "سداسياته"(ق 225/ 1) عن ليث بن أبي سليم عن مجاهد عن ابن عمر مرفوعاً.

قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ ليث بن أبي سليم ضعيف مختلط.

ص: 391

وأعله الهيثمي بغيره؛ فقال (2/ 217-218) :

"رواه الطبراني في "الكبير"، وفيه عبد الرحيم بن يحيى، وهو ضعيف. وروى أحمد منه: "وركعتي الفجر حافظوا عليهما؛ فإن فيهما الرغائب". وفيه رجل لم يسم"!

فأقول: عبد الرحيم هذا ليس في طريق ابن ثرثال، فإعلاله بالليث أولى؛ كما فعلنا.

وله طريق أخرى؛ أخرجه الإمام أحمد (2/ 82) من طريق أيوب بن سليمان - وجل من أهل صنعاء - عن ابن عمر مرفوعاً في حديث طويل بلفظ:

"وركعتا الفجر حافظوا عليهما؛ فإنهما من الفضائل".

وأيوب هذا؛ قال فيه الحافظ في "التعجيل":

"فيه جهالة".

وتساهل الشيخ أحمد شاكر في "تعليقه على المسند"(7/ 292)، فصحح حديثه هذا؛ وعلل ذلك بقوله:

"وإنما صححت حديثه بأنه تابعي مستور، لم يذكر بجرح، فحديثه حسن على الأقل، ثم لم يأت فيه شيء منكر انفرد به؛ كما سيأتي، فيكون حديثه هذا صحيحاً"!!

ثم أطال النفس في ذكر الشواهد لحديثه هذا الطويل وتخريجها، ولكنه بالنسبة لهذه الفقرة الخاصة بالركعتين لم يذكر لها شاهداً إلا حديث الترجمة، ونقل كلام

ص: 392